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  • Writer's pictureMeenakshi Raje

गुलाबो सपेरा-एक अतुल्य विरासत





जयपुर साहित्य मेला का 2021, 14वां संस्करण है जो 19 फरवरी 2021 -28 फरवरी 2021 तक चलेगा।कोरोना महामारी के कारण इस बार सभी लोग आभासी रूप से जुड़ पाए हैं।


आज शाम में जिस शख़्सियत से पहचान करवाई गई वह अपने आप में एक मिसाल हैं।

नाम गुलाबो सपेरा। उनका जन्म 1960 में घुमंतू  कालबेलिया समुदाय में हुआ ।ऐसा समाज जो साँपो का नाच दिखाकर,घूम-घूम कर अपना जीवन यापन करता।


1960 ,ऐसा दशक जहाँ सभ्य समाज की महिलाओं को भी अधिकारों से वंचित रखा जाता था और सवाल जब घुमंतू लोगों का हो तो स्त्री का जन्म उनके लिये एक बोझ से अधिक कुछ भी न था।चूंकि उनका जन्म धनतेरस के दिन हुआ इसलिए गुलाबो सपेरा का नाम धनवंती।


पुनर्जन्म

गुलाबो सपेरा बताती हैं कि उनके समुदाय में लड़कियों को जन्म लेते ही गाड़ दिया जाता था। हालांकि औरतें वे खरीद कर लाते पर बेटियों का जन्म एक बोझ ही था।तो ऐसा ही उनके साथ हुआ।उनका जब जन्म हुआ तो उन्हें भी गाड़ दिया गया।


उनके पिता दिवाली की खरीददारी के लिए बाज़ार गए थे।इधर इनकी माँ का रो-रो कर बुरा हाल।वो मिन्नतें करती रहीं कि कोई उनकी लाडली का पता बता दे कि उन्हें गाड़ा कहाँ गया ।अंत में उनकी मौसी और माँ ने पाँच घण्टे बाद उन्हें धरती की गोद से बाहर निकाला।

उन्हें तो पूरे समाज में नारी की प्रतिष्ठा स्थापित करनी थी व अपने प्रतिभा का लोहा मनवाना था।उनकी साँसे इतनी जल्दी कैसे छीन जातीं।


खैर ,गुलाबो बड़ी हुईं और उन्हें नाचने का शौक चढ़ गया।वो पुष्कर में अपने करतब दिखातीं ।


अजमेर से जयपुर


गुलाबो के सफर में तृप्ति पांडे का बहुत बड़ा योगदान है। तृप्ति पांडे पर्यटन और संस्कृति और यात्रा लेखन के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम है। राजस्थान की सांस्कृतिक राजदूत के रूप में कहा जाता है, वह जीवित विरासतों पर शोध और प्रस्तुत करने में अग्रणी रही हैं। उन्होंने गुलाबो की विलक्षण प्रतिभा को पहचाना और अनेकों यत्न कर के गुलाबो पहुँच गईं जयपुर।


गुलाबो बताती हैं कि वह अपने भाई की लाडली थीं और तृप्ति जी को परी मैडम कह कर बुलाती हैं।जब उन्हें पता चला कि उनकी परी मैडम ने उन्हें जयपुर बुलाया तो सख़्त मनाही के बावजूद अपने भाई की खूब मनुहार कर वह तृप्ति पांडे के पास चली गईं।

इस कारण उनके पिता को उनके समाज से बाहर निकाल दिया गया।कुछ दिनों के बाद उनके पिता की मृत्यु भी हो गई।तब उनको तृप्ति पांडे ने संभाला।


धनवंती से गुलाबो

चूँकि वह तृप्ति पांडे को पुष्कर में मिली थीं जहाँ गुलाबों की खेती की जाती है तो वह उन्हें गुलाबी के नाम से बुलाने लगीं।

इतना विलक्षण नृत्य कि जो बस देखे देखता ही रह जाए।उन्हें अखबारों में जगह मिलने लगी।उनकी प्रसिद्धि इतनी फैली कि वो अमेरिका में कालबेलिया समाज का प्रतिनिधित्व करती नज़र आईं।उन्होंने अपने नृत्य को साँपो का नृत्य कहा और तब से वो बन गईं गुलाबो सपेरा।


जीवनसाथी

उनके विवाह की घटना भी बड़ी दिलचस्प है।गुलाबो बताती हैं कि उनके बींद आरा मशीन में काम करते थे। वह इस समुदाय के नृत्य कार्यक्रमों में ढोलक बजाते थे ।1983 में उन्हें कालबेलिया समाज का सदस्य बना दिया गया।गुलाबो उस समय महज 7 वर्ष की थीं और उनके बींद 25 वर्ष के युवक।वह आगे बताती हैं कि उन्होंने ही पहली बार गुलाबो के लिए घाघरा और कमीज का कपड़ा लाया था और उसे सिलवाया भी था।उन्हें साईकिल पर बिठाकर जगह-जगह ले जाते।गुलाबो की प्रसिद्धि से जलकर लोगों ने बदनामी करनी शुरू कर दी और इन घटनाओं को प्रेम प्रसंग करार दिया।अंततः दोनों की शादी हुई।


उपलब्धियाँ


एक ऐसी शख्सियत जिसे सलाम करने का मन करे।ऐसा जज़्बा,ऐसी हिम्मत और मेहनत इतनी कि ईश्वर भी नतमस्तक हो जाएँ।

अमेरिका से लौटने के बाद उनके समाज ने उन्हें सहर्ष स्वीकार ही नहीं किया बल्कि उन्होंने यह प्रतिज्ञा भी ली कि अब बेटियों को मारने का अपराध नहीं करेंगे।उन्होंने गुलाबो को अपने समाज का अध्यक्ष भी बनाया।


गुलाबो सपेरा ने कालबेलिया लोकनृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत सरकार ने उन्हें २०१६ में पद्म श्री के नागरिक सम्मान से सम्मानित किया।


आज भी जब वह 'बिटी म्हारी सोना री ओ तीर' गाती हैं तो अपनी धरोहर पर गर्व करने का मन होता है।

आज भी वह उतनी ही सादगी और विलक्षणता के साथ नाचती और गाती हैं।निश्चय ही वह हमारे देश की धरोहर हैं।



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