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  • Writer's picturePrabhat Bandhulya

जिसने भी जैसे समझा,वैसे ही उसके राम हुए

वह मनुज है  अथवा अवतारी,

यह प्रश्न स्वयं में है भारी,

जो मनुज हुए तो मर्यादित,

कैसे इतना रह पाए हैं,




जो मनुज हुए तो षडविकार से कैसे वे बच पाए हैं,

जो मनुज हुए तो लेश मात्र भी सत्ता का मोह नहीं आया,

जो मनुज हुए तो कैसे उनका मन त्याग से ना घबराया,

जो मनुज हुए तो जात-धर्म हर भेद-भाव से दूर हुए,

इतनी धन-सम्पदा के रहते कैसे न मद में चूर हुए?

होकर फिर इतना विशेष, कैसे वे ऐसे आम हुए,

जिसने भी जैसे समझा,

वैसे ही उसके राम हुए





युग त्रेता में चौदह,

 कलयुग में साठ साल वनवास किया,

बने रहे दाता फिर भी पूरन हर जीव का आस किया,

तो आज अयोध्या हर्षित है,

मन मिथिला का भी गर्वित है,

बेघर थे युग से रघुराई,

आज उनका महल सुसज्जित है,





सज रहा सिया का ससुराल,

पीहर में रौनक छाई है,

है अवध सुशोभित दीपों से

मिथिला में दीवाली आई है,

खग-पशु,अचर-चर, वायु-पवन, 

वह सबके ही अभिराम हुए,

जिसने भी जैसे समझा,

वैसे ही उसके राम हुए

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